सोशल मीडिया की खबर मात्र अफवाह , प्रदेश में नेतृत्व परिवर्तन की कोई संभावना नहीं।

कुछ दिनों से सोशल मीडिया और कुछ वेब पोर्टलों में सूबे में नेतृत्व परिवर्तन की अफवाहों की चर्चा जोरों पर है। अपनी ही पार्टी में हासिये पर चल रहे पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने अपने को सूर्खियों में लाने के लिए एक बयान देकर आग में घी डालने जैसा काम कर दिया। इतना ही नहीं भाजपा के दो चार विधायक और कुछ छुटभैय्या नेता जिनकी तीन साल में महत्वाकांक्षा पुरी नहीं  हुई ,वो सोशल मीडिया और कुछ वेब पोर्टलों के सहारे इस आधारहीन झूठी खबर को हवा दे  रहे हैं। जबकि नेतृत्व  परिवर्तन की अफवाह का दूर-दूर तक   कोई संभावना नहीं है। इस तरह की   अफवाह से प्रदेश में  राजनीतिक अस्थिरता पैदा करने की कोशिश की जा रही है ।इसके सिवा और कुछ नहीं। यह  मुख्यमंत्री की बढ़ती लोकप्रियता से बौखलाहट में विपक्ष और उनके विरोधियों का एक मात्र षड्यंत्र है । जिस तरह रावत सरकार समर्पित भाव से प्रदेश के विकास में काम कर रही है । भ्रष्टाचार पर  अंकुश लगा है, विकास कार्यों में तेजी से काम हो रहा है ,हर वर्ग में मुख्यमंत्री की लोकप्रियता बढ़ी है, पार्टी में भी मुख्यमंत्री लोकप्रियता बढ़ी है, इसका लाभ पार्टी को मिलता दिखाई दे रहे है। यदि राजनीति में जीत को ही  मानक माना जाता है  तो राज्य में त्रिवेंद्र   अब तक के सबसे सफल मुख्यमंत्री हैं।


राज्य में उनके कार्यकाल में जितने भी चुनाव हुए , पार्टी को बड़ी सफलता मिली है ।उनकी  स्वच्छ ईमानदार छवि कुछ लोगों को पसंद नहीं आ रही है जो इस तरह की झूठी अफवाह को फैला कर राज्य में नेतृत्व परिवर्तन चाहते हैं । क्योंकि   भ्रष्टाचार के खिलाफ त्रिवेंद्र  ने जो चाबुक चलाया। उससे इन की दुकानें बंद हो गई ,और यह उसी बौखलाहट का एक हिस्सा है । 3 साल से  मुख्यमंत्री को हटाने की मुहिम में लगे कुछ नेताओं को दिल्ली चुनाव में भाजपा को मिली करारी हार संजीवनी दे गई  ,प्रदेश में नेतृत्व परिवर्तन नहीं बल्कि  मंत्रिमंडल में फेरबदल की आवश्यकता है। कुछ वरिष्ठ मंत्री जो खुद को मुख्यमंत्री का प्रबल दावेदार मानते हैं उनकी यदि तीन साल की परफॉर्मेंस देखी जाए तो उनके नाम पर कोई खास उपलब्धि नहीं है एक बड़ा नेता जो इन दिनों मुख्यमंत्री की कुर्सी पर टकटकी  लगाए  है और अक्सर प्रदेश से बाहर ही रहते हैं  प्रदेश पदाधिकारियों से भी उनका परिचय ठीक ढंग से नहीं है  तो कार्यकर्ता तो दूर की बात है कार्यकर्ताओं को उनसे काम करवाना टेढ़ी खीर है। उनके मंत्रालय की स्थिति तीन साल में ठीक नहीं कही जा सकती। राज्य गठन के बाद से  ही नेताओं की कुर्सी की लालसा  ने जो भी मुख्यमंत्री बना उसके खिलाफ मोर्चा खोला नेतृत्व परिवर्तन के प्रयोग इस प्रदेश के लिए कोई नई बात नहीं है।  पहले की सरकारों में भी यह प्रयोग  देखने को मिला । लेकिन उसका रिजल्ट सबके सामने रहा । हाईकमान भी नेतृत्व परिवर्तन के मूड में कतई नहीं है हाईकमान  मुख्यमंत्री के कार्य से संतुष्ट है इस तरह की खबर से राज्य में राजनीतिक अस्थिरता का माहौल बन रहा हैै ।  जो राज्य हित में ठीक नहीं है।